Aarti

Kailasavasi Shiva Aarti

शीश गंग अर्धांग पार्वती

A traditional Hindi aarti picturing Shiva, Parvati and the divine assembly amid the splendour of Kailasa.

HindiOptional meaning6 min
🔱Dedicated toLord Shiva
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शीश गंग अर्धांग पार्वती, सदा विराजत कैलासी। नन्दी भृंगी नृत्य करत हैं, धरत ध्यान सुर सुखरासी॥

शीतल मन्द सुगन्ध पवन बह, बैठे हैं शिव अविनाशी। करत गान गन्धर्व सप्त स्वर, राग-रागिनी मधुरासी॥

यक्ष रक्ष भैरव जहाँ डोलत, बोलत हैं वन के वासी। कोयल शब्द सुनावत सुन्दर, भ्रमर करत हैं गुञ्जा-सी॥

कल्पद्रुम अरु पारिजात तरु, लाग रहे हैं लक्षासी। कामधेनु कोटिन जहाँ डोलत, करत दुग्ध की वर्षा-सी॥

सूर्यकान्त सम पर्वत शोभित, चन्द्रकान्त सम हिमराशी। नित्य छहों ऋतु रहत सुशोभित, सेवत सदा प्रकृति-दासी॥

ऋषि-मुनि देव दनुज नित सेवत, गान करत श्रुति गुणराशी। ब्रह्मा-विष्णु निहारत निशिदिन, कछु शिव हमकूँ फरमासी॥

ऋद्धि-सिद्धि के दाता शंकर, नित सत्-चित्-आनन्दराशी। जिनके सुमिरत ही कट जाती, कठिन काल-यम की फाँसी॥

त्रिशूलधर जी का नाम निरन्तर, प्रेम सहित जो नर गासी। दूर होय विपदा उस नर की, जन्म-जन्म शिवपद पासी॥

कैलासी काशी के वासी, अविनाशी मेरी सुध लीजो। सेवक जान सदा चरणन को, अपनो जान कृपा कीजो॥

तुम तो प्रभु जी सदा दयामय, अवगुण मेरे सब ढकियो। सब अपराध क्षमा कर शंकर, किंकर की विनती सुनियो॥

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Meaning & context

What does Kailasavasi Shiva Aarti mean?

The aarti first paints Kailasa as a living sacred world, then turns inward as a humble prayer for remembrance, forgiveness and grace.