महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्
Mahishasura Mardini Stotram
Ayi Giri Nandini — twenty-one cascading verses to the Goddess who slew Mahishasura, among the most musical hymns in Sanskrit devotion.
Dedicated toदुर्गाअयिगिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दनुतेगिरिवरविन्ध्य-शिरोधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते।भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥१॥
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणी हर्षरतेत्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते।दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥२॥
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्बवनप्रियवासिनि हासरतेशिखरिशिरोमणि तुङ्गहिमालयशृङ्गनिजालयमध्यगते।मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥३॥
अयि शतखण्डविखण्डितरुण्डवितुण्डितशुण्डगजाधिपतेरिपुगजगण्डविदारणचण्डपराक्रमशुण्डमृगाधिपते।निजभुजदण्डनिपातितखण्डविपातितमुण्डभटाधिपतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥४॥
अयि रणदुर्मदशत्रुवधोद्यतदुर्धरनिर्जरशक्तिभृतेचतुरविचारधुरीणमहाशिवदूतकृतप्रमथाधिपते।दुरितदुरीहदुराशयदुर्मतिदानवदूतकृतान्तमतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥५॥
अयि शरणागतवैरिवधूवरवीरवराभयदानकरेत्रिभुवनमस्तकशूलविरोधिशिरोधिकृतामलशूलकरे।दुमिदुमितामरदुन्दुभिनादमहो मुखरीकृततिग्मकरेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥६॥
अयि निजहुङ्कृतिमात्रनिराकृतधूम्रविलोचनधूम्रशतेसमरविशोषितशोणितबीजसमुद्भवशोणितबीजलते।शिवशिवशुम्भनिशुम्भमहाहवतर्पितभूतपिशाचरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥७॥
धनुरनुसंगरणक्षणसंगपरिस्फुरदङ्गनटत्कटकेकनकपिशङ्गपृषत्कनिषङ्गरसद्भटशृङ्गहताबटुके।कृतचतुरंगबलक्षितिरङ्गघटद्बहुरङ्गरटद्बटुकेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥८॥
सुरललना-ततथेयि-तथेयि-कृताभिनयोदर-नृत्यरतेकृतकुकुथः कुकुथो गडदादिक-ताल-कुतूहल-गानरते।धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमितध्वनिधीरमृदङ्गनिनादरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥९॥
जय-जय-जप्य-जयेजयशब्द-परस्तुति-तत्परविश्वनुतेझण-झण-झिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरसिंजितमोहित भूतपते।नटितनटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥१०॥
अयि सुमनः सुमनः सुमनः सुमनः सुमनोहरकांतियुतेश्रितरजनी-रजनीरजनी-रजनीरजनीकर-वक्त्रवृते।सुनयनविभ्रमर-भ्रमरभ्रमर-भ्रमरभ्रमराधिपतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥११॥
सहितमहाहव-मल्लमतल्लिक-मल्लितरल्लक-मल्लरतेविरचितवल्लिक-पल्लिकमल्लिक-भिल्लिकभिल्लिक-वर्गवृते।सित्कृत्पुल्लसमुल्लसितारुण-तल्लज-पल्लव-सल्ललितेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥१२॥
अविरलगण्ड-गलन्मदमेदुर-मत्तमत्तंगज-राजपतेत्रिभुवनभूषणभूत-कलानिधि-रूपपयोनिधि-राजसुते।अयि सुदतीजन-लालसमानस-मोहनमन्मथराजसुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥१३॥
कमलदलामल-कोमलकान्ति-कला-कलितामल-भाललतेसकलविलास-कलानिलयक्रम-केलिचलत्कल-हंसकुले।अलिकुलसङ्कुल-कुवलयमण्डल-मौलिमिलद्बकुलालिकुलेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥१४॥
करमुरलीरव-वीजितकूजित-लज्जितकोकिल-मञ्जुमतेमिलितपुलिन्द-मनोहरगुंजित-रंजितशैल-निकुञ्जगते।निजगुणभूत-महाशबरीगण-सद्गुणसम्भृत-केलितलेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥१५॥
कटितटपीत-दुकूलविचित्र-मयूखतिरस्कृत-चन्द्ररुचेप्रणतसुरासुर-मौलिमणिस्फुरदंशुल-सन्नख-चन्द्ररुचे।जितकनकाचल-मौलिपदोर्जित-निर्भरकुंजर-कुम्भकुचेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥१६॥
विजितसहस्र-करैक-सहस्र-करैक-सहस्र-करैकनुतेकृतसुरतारक-सङ्गरतारक-सङ्गरतारक-सुनूसुते।सुरथसमाधि-समानसमाधि-समाधि-समाधि-सुजातरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥१७॥
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योनुदिनम् स शिवेअयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत्।तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥१८॥
कनकलसत्कलसिन्धु-जलैरनु-सिञ्चिनुते गुणरङ्गभुवम्भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भ-सुखानुभवम्।तवचरणं शरणङ्करवाणि नतामरवाणिनिवासिशिवम्जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥१९॥
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननुकूलयतेकिमु पुरुहूतपुरीन्दु-मुखी-सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते।मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥२०॥
अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमेअयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते।यदुचितमत्र भवत्युररी-कुरुतादुरुतापमपाकुरुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥२१॥
स्तुतिमिमां स्तिमितः सुसमाधिना नियमतो यमतोनुदिनं पठेत्।परमया रमया स निषेव्यते परिजनोऽरिजनोऽपि च तं भजेत् ॥॥ हरिः ॐ तत्सत् महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रं हरिः ॐ तत्सत् ॥
Sanskrit Wikisource — महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् (revision 418534)
Underlying stotra is public domain; cited Wikisource transcription is CC BY-SA
Complete twenty-one-verse recension with its closing phalashruti. Verse numbering was normalised from Latin to Devanagari numerals, a zero-width non-joiner inside the number of verse 11 and a stray danda in the same verse were removed, an obvious typo (त्रिभिवन for त्रिभुवन, verse 13) was corrected, and refrain spacing in verse 9 was made consistent. A promotional line carrying a personal name and phone number, added to the wiki page by an editor, is not part of the hymn and is excluded. No verse was added, removed or reordered.
Meaning & context
The Mahishasura Mardini Stotram is built on a single cascading metre in which every line chimes internally, so that the sound of the hymn carries as much of its meaning as the words do. Its twenty-one verses move from the Goddess's victory over Mahishasura through the battles of the Durga Saptashati, then through long passages of pure description — dance, music, jewellery, mountains, bees and flowering trees — before turning in the last four verses into direct, personal appeal. The closing verse belongs to the traditional phalashruti form, which states the fruit of recitation in the confident idiom of devotional poetry rather than as a literal promise. Attribution to Adi Shankaracharya is traditional; some scholars assign the hymn to the later poet Ramakrishna Kavi.