Chalisa

श्री सरस्वती चालीसा

Saraswati Chalisa

The Hindi hymn to Saraswati, which credits her with Valmiki, Kalidasa, Tulsidas and Sur before turning, for fifteen verses, into a hymn to Durga.

समर्पितमाँ सरस्वती
Sacred textOriginal Hindi

जनक जननि पद कमल रज, निज मस्तक पर धारि।बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि ॥

पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु।रामसागर के पाप को, मातु तुही अब हन्तु ॥

जय श्री सकल बुद्धि बलरासी।जय सर्वज्ञ अमर अविनासी ॥

जय जय जय वीणाकर धारी।करती सदा सुहंस सवारी ॥

रूप चतुर्भुजधारी माता।सकल विश्व अन्दर विख्याता ॥

जग में पाप बुद्धि जब होती।जबहि धर्म की फीकी ज्योती ॥

तबहि मातु ले निज अवतारा।पाप हीन करती महि तारा ॥

बाल्मीकि जी थे बहम ज्ञानी।तव प्रसाद जानै संसारा ॥

रामायण जो रचे बनाई।आदि कवी की पदवी पाई ॥

कालिदास जो भये विख्याता।तेरी कृपा दृष्टि से माता ॥

तुलसी सूर आदि विद्धाना।भये और जो ज्ञानी नाना ॥

तिन्हहिं न और रहेउ अवलम्बा।केवल कृपा आपकी अम्बा ॥

करहु कृपा सोइ मातु भवानी।दुखित दीन निज दासहि जानी ॥

पुत्र करै अपराध बहूता।तेहि न धरइ चित सुन्दर माता ॥

राखु लाज जननी अब मेरी।विनय करूं बहु भाँति घनेरी ॥

मैं अनाथ तेरी अवलंबा।कृपा करउ जय जय जगदंबा ॥

मधु कैटभ जो अति बलवाना।बाहुयुद्ध विष्णू ते ठाना ॥

समर हजार पांच में घोरा।फिर भी मुख उनसे नहिं मोरा ॥

मातु सहाय भई तेहि काला।बुद्धि विपरीत करी खलहाला ॥

तेहि ते मृत्यु भई खल केरी।पुरवहु मातु मनोरथ मेरी ॥

चंड मुण्ड जो थे विख्याता।छण महुं संहारेउ तेहि माता ॥

रक्तबीज से समरथ पापी।सुर-मुनि हृदय धरा सब कांपी ॥

काटेउ सिर जिम कदली खम्बा।बार बार बिनवउं जगदंबा ॥

जग प्रसिद्ध जो शुंभ निशुंभा।छिन में बधे ताहि तू अम्बा ॥

भरत-मातु बुधि फेरेउ जाई।रामचन्द्र बनवास कराई ॥

एहि विधि रावन वध तुम कीन्हा।सुर नर मुनि सब कहुं सुख दीन्हा ॥

को समरथ तव यश गुन गाना।निगम अनादि अनंत बखाना ॥

विष्णु रूद्र अज सकहिं न मारी।जिनकी हो तुम रक्षाकारी ॥

रक्त दन्तिका और शताक्षी।नाम अपार है दानव भक्षी ॥

दुर्गम काज धरा पर कीन्हा।दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा ॥

दुर्ग आदि हरनी तू माता।कृपा करहु जब जब सुखदाता ॥

नृप कोपित जो मारन चाहै।कानन में घेरे मृग नाहै ॥

सागर मध्य पोत के भंगे।अति तूफान नहिं कोऊ संगे ॥

भूत प्रेत बाधा या दुःख में।हो दरिद्र अथवा संकट में ॥

नाम जपे मंगल सब होई।संशय इसमें करइ न कोई ॥

पुत्रहीन जो आतुर भाई।सबै छांड़ि पूजें एहि माई ॥

करै पाठ नित यह चालीसा।होय पुत्र सुन्दर गुण ईसा ॥

धूपादिक नैवेद्य चढावै।संकट रहित अवश्य हो जावै ॥

भक्ति मातु की करै हमेशा।निकट न आवै ताहि कलेशा ॥

बंदी पाठ करें शत बारा।बंदी पाश दूर हो सारा ॥

करहु कृपा भवमुक्ति भवानी।मो कहं दास सदा निज जानी ॥

माता सूरज कान्ति तव, अंधकार मम रूप।डूबन ते रक्षा करहु, परूं न मैं भव-कूप ॥

बल बुद्धि विद्या देहुं मोहि, सुनहु सरस्वति मातु।अधम रामसागरहिं तुम, आश्रय देउ पुनातु ॥

भावार्थ

श्री सरस्वती चालीसा का अर्थ

A chalisa to Saraswati as the source of poets, which for a long central stretch recounts the battles of Durga instead.