Bhajan
काहे को अनेक देव सेवत
Kahe Ko Anek Dev Sevat
Tulsidas contrasts exhausting spiritual striving with simple, trusting devotion to the generous Lord Shiva.
समर्पितभगवान शिवकाहे को अनेक देव सेवत, जागै मसान, खोवत अपान, सठ होत हठि प्रेत रे।
काहे को उपाय कोटि करत, मरत धाय, जाचत नरेस देस-देस के, अचेत रे॥
तुलसी प्रतीति बिनु त्यागै तैं प्रयाग तनु, धन ही के हेतु दान देत कुरुखेत रे।
पात द्वै धतूरे के दै, भोरे कै भवेस सों, सुरेस हू की संपदा सुभाय सों न लेत रे॥
काहे को अनेक देव सेवत का अर्थ
A Shiva devotional verse by Goswami Tulsidas from the Uttarakand of Kavitavali, presented with concise bilingual explanations.