श्री बटुक भैरव चालीसा
Batuk Bhairav Chalisa
The Hindi hymn to the boy Bhairav, kotwal of Kashi, which runs through thirty of his names and then turns into a Rajasthani story about his sister's wedding.
समर्पितभगवान शिवविश्वनाथ को सुमिर मन, धर गणेश का ध्यान।भैरव चालीसा रचूं, कृपा करहु भगवान ॥
बटुकनाथ भैरव भजूं, श्री काली के लाल।मुझ दास पर कृपा करो, काशी के कुतवाल ॥
जय जय श्री काली के लाला।रहो दास पर सदा दयाला ॥
भैरव भीषण भीम कपाली।क्रोधवन्त लोचन में लाली ॥
कर त्रिशूल है कठिन कराला।गल में प्रभु मुण्डन की माला ॥
कृष्ण रूप तन वर्ण विशाला।पीकर मद रहता मतवाला ॥
रुद्र बटुक भक्तन के संगी।प्रेतनाथ भूतेश भुजंगी ॥
त्रैलतेश है नाम तुम्हारा।चक्र तुण्ड अमरेश पियारा ॥
शेखरचंद्र कपाल बिराजे।स्वान सवारी पै प्रभु गाजे ॥
शिव नकुलेश चण्ड हो स्वामी।बैजनाथ प्रभु नमो नमामी ॥
अश्वनाथ क्रोधेश बखाने।भैरों काल जगत ने जाने ॥
गायत्री कहैं निमिष दिगम्बर।जगन्नाथ उन्नत आडम्बर ॥
क्षेत्रपाल दसपाण कहाये।मंजुल उमानन्द कहलाये ॥
चक्रनाथ भक्तन हितकारी।कहैं त्र्यम्बक सब नर नारी ॥
संहारक सुनन्द तव नामा।करहु भक्त के पूरण कामा ॥
नाथ पिशाचन के हो प्यारे।संकट मेटहु सकल हमारे ॥
कृत्यायु सुन्दर आनन्दा।भक्त जनन के काटहु फन्दा ॥
कारण लम्ब आप भय भंजन।नमो नाथ जय जनमन रंजन ॥
हो तुम देव त्रिलोचन नाथा।भक्त चरण में नावत माथा ॥
त्वं अशतांग रुद्र के लाला।महाकाल कालों के काला ॥
ताप विमोचन अरिदल नासा।भाल चन्द्रमा करहिं प्रकाशा ॥
श्वेत काल अरु लाल शरीरा।मस्तक मुकुट शीश पर चीरा ॥
काली के लाला बलधारी।कहाँ तक शोभा कहूँ तुम्हारी ॥
शंकर के अवतार कृपाला।रहो चकाचक पी मद प्याला ॥
काशी के कुतवाल कहाओ।बटुकनाथ चेटक दिखलाओ ॥
रवि के दिन जन भोग लगावें।धूप दीप नैवेद्य चढ़ावें ॥
दर्शन करके भक्त सिहावें।दारुड़ा की धार पिलावें ॥
मठ में सुन्दर लटकत झावा।सिद्ध कार्य कर भैरों बाबा ॥
नाथ आपका यश नहीं थोड़ा।करमें सुभग सुशोभित कोड़ा ॥
कटि घूँघरा सुरीले बाजत।कंचनमय सिंहासन राजत ॥
नर नारी सब तुमको ध्यावहिं।मनवांछित इच्छाफल पावहिं ॥
भोपा हैं आपके पुजारी।करें आरती सेवा भारी ॥
भैरव भात आपका गाऊँ।बार बार पद शीश नवाऊँ ॥
आपहि वारे छीजन धाये।ऐलादी ने रुदन मचाये ॥
बहन त्यागि भाई कहाँ जावे।तो बिन को मोहि भात पिन्हावे ॥
रोये बटुक नाथ करुणा कर।गये हिवारे मैं तुम जाकर ॥
दुखित भई ऐलादी बाला।तब हर का सिंहासन हाला ॥
समय व्याह का जिस दिन आया।प्रभु ने तुमको तुरत पठाया ॥
विष्णु कही मत विलम्ब लगाओ।तीन दिवस को भैरव जाओ ॥
दल पठान संग लेकर धाया।ऐलादी को भात पिन्हाया ॥
पूरन आस बहन की कीनी।सुर्ख चुन्दरी सिर धर दीनी ॥
भात भरा लौटे गुणग्रामी।नमो नमामी अन्तर्यामी ॥
जय जय जय भैरव बटुक, स्वामी संकट टार।कृपा दास पर कीजिए, शंकर के अवतार ॥
जो यह चालीसा पढ़े, प्रेम सहित सत बार।उस घर सर्वानन्द हों, वैभव बढ़े अपार ॥
श्री बटुक भैरव चालीसा का अर्थ
A chalisa to Bhairav in his boy form: the guardian of Kashi with his dog, his skull-garland and his cup, told through a long litany of names and then through a folk story of the gift he carried to his sister.